The States (राज्यों का शासन) – Article 152 to 237 (अनुच्छेद 152 से 237)

The States (राज्यों का शासन) - Article 152 to 237

The States (राज्यों का शासन) – Article 152 to 237 (अनुच्छेद 152 से 237) contents

The States (राज्यों का शासन) – Article 152 to 237 (अनुच्छेद 152 से 237)

राज्यपाल 

  • राज्यों की कार्यकारिणी का प्रधान राज्यपाल है, संविधान के अनुसार, भारत राज्यों का एक संघ है। भारतीय प्रशासन की एक विशेषता यह है कि संघ तथा राज्यों के स्तर पर संसदीय शासन प्रणाली स्थापित की गयी है। जिस प्रकार भारतीय संघ की कार्यकाशित का मुखिया राष्ट्रपति है, उसी प्रकार राज्यों की कार्यकारिणी का प्रधान राज्यपाल है।
  • राष्ट्रपति की भांति राज्यपाल भी मंत्रिपरिषद की सहायता तथा परामर्श के साथ अपनी कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 160 तक राज्यपाल की नियुक्ति, शक्तियों तथा कार्यों का वर्णन किया गया है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार, प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होगा और अनुच्छेद 154 में कहा गया है कि राज्य की समस्त कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह खुद या अपने अधीनस्थों से करवायेगा।।
  • अनुच्छेद 155 के अनुसार, राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं एवं राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त ही पद धारण करता है। उसका कार्यकाल पांच वर्षों का है, परन्तु समय से पहले उसे हटाया जा सकता है-यदि उस पर कदाचार सिद्ध हो या उस पर अक्षमता के आरोप लगें।
  • राज्य विधानमंडल के वर्ष की प्रथम बैठक एवं चुनावों के बाद की संयुक्त बैठक को राज्यपाल ही संबोधित करता है। अनुच्छेद 176 में यह बात
    कही गयी है।
  • संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार, राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। उसके अध्यादेश का वही महत्त्व है, जो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित कानूनों का। यदि विधानसभा अपनी प्रथम बैठक में इसे स्वीकृति नहीं करती, तो बैठक की तारीख से 6 सप्ताह बाद अध्यादेश स्वतः खत्म हो जाता है।
  • यद्यपि राज्यपाल को सैनिक न्यायालय द्वारा दिये गये मृत्युदंड को माफ कर का अधिकार नहीं है, तथापि संविधान के अनुच्छेद 161 के अनसार तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 54 के अनुसार उसे सैनिक न्यायालय द्वारा दिये गये मृत्युदंड को छोड़कर, अन्य सजाओं को कम करने, उसे दूसरी सजा में बदलने या उसके परिहार करने का अधिकार प्राप्त है।
  • संविधान के अनुच्छेद 200 के अन्तर्गत राज्यपाल किसी विधेयक को विधानमंडल के पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं, परन्तु राज्य विधानमंडल द्वारा दुबारा भेजे जाने पर राज्यपाल अपनी स्वीकृति देने के लिए बाध्य है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 201 के अनुसार, राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रख सकता है या राष्ट्रपति के कहने उसे मंत्रिमंडल में पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। मंत्रिमंडल द्वारा पारित होने के बाद वह पुनः उक्त विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित कर सकता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 202 में कहा गया है कि राज्यपाल प्रतिवर्ष राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) दोनों सदनों में रखवायेगा।
  • अनुच्छेद 207 कहता है कि धन एवं वित्त विधेयक विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही पेश किये जायेंगे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा।
  • संविधान के सातवें संशोधन, 1956 के अनुसार, दो या दो से अधिक राज्यों के लिए भी एक राज्यपाल हो सकता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 174(1) के अनुसार, वह विधानसभा का अधिवेशन बुला सकता है, उसका सत्रावसान कर सकता है एवं 174(2) के अनुसार, विधानसभा को विघटित भी कर सकता है, जैसा कई राज्यपालों ने किया भी है।
  • संविधान के अनुच्छेद 157 के अनुसार, राज्यपाल होने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति भारत का नागरिक हो, पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, केन्द्र या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर न हो एवं संसद द्वारा समय-समय पर निर्धारित योग्यताओं को पूरा करता हो।

मंत्रिपरिषद एवं मुख्यमंत्री

  • संविधान के अनुच्छेद 163(1) के अनुसार, राज्यपाल के विवेकी कार्यों को छोड़कर, उसे अन्य कार्यों में सहायता प्रदान करने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
  • अनुच्छेद 163(2) के अनुसार, राज्यपाल द्वारा अपने विवेक से किये गये कार्यों पर यह प्रश्न नहीं उठेगा कि ऐसा करना उसके विवेकाधिकार में नहीं था। पुन: अनुच्छेद 163(3) में कहा गया है कि मंत्रिपरिषद ने राज्यपाल को क्या सलाह दी, यह प्रश्न भी किसी न्यायालय में नहीं उठाया जा सकेगा।
  • संसदीय प्रणाली होने के कारण केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की तरह राज्य की मंत्रिपरिषद भी वास्तविक कार्यपालिका है, जबकि राज्यपाल का पद एवं उसकी स्थिति राष्ट्रपति की तरह संवैधानिक है।
  • अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, यदि कोई मंत्री किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे 6 महीने के अन्दर किसी भी सदन (राज्य विधानमंडल के) का सदस्य बन जाना होगा, अन्यथा वह 6 महीने बाद मंत्री नहीं रह सकेगा।
  • संविधान के अनुच्छेद 164(5) के अनुसार, मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते राज्य विधानमंडल द्वारा बनायी गयी विधियों के अनुसार होंगे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 167 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री का यह कर्त्तव्य होगा कि वह राज्यपाल को राज्य मंत्रिपरिषद एवं विधानमंडल की कार्यवाहियों के बारे में सूचित करे। अनुच्छेद 167(ख) के अनुसार, राज्य प्रशासन के संदर्भ में सूचना माँगे जाने पर मुख्यमंत्री राज्यपाल को सूचना देगा एवं अनुच्छेद 167(ग) के अनुसार, यदि किसी मंत्री ने किसी विषय पर कोई आश्वासन दिया है, तो राज्यपाल के कहने पर उसे मंत्रिपरिषद में रखा जायेगा।
  • संविधान के अनुच्छेद 165 के अनुसार, प्रत्येक राज्य में एक महाधिवक्ता होगा, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करेगा एवं वह राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त ही पद धारण करेगा।
    यदि कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता है, तो उसकी नियुक्ति महाधिवक्ता पद पर हो सकती है।
  • महाधिवक्ता राज्य का प्रथम विधि अधिकारी होगा और राज्यपाल द्वारा सलाह मांगे जाने पर उसे अपनी कानूनी सलाह उपलब्ध करवायेगा। महाधिवक्ता विधानमंडलों की बैठक में भाग ले सकेगा, लेकिन उसे मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होगा। महाधिवक्ता को वही वेतन मिलेगा, जो राज्यपाल समय-समय पर निश्चित करेगा।
    8. मंत्रिपरिषद के प्रमख कार्यों में नीति-निर्माण करना एवं उसे लागू करना, नियुक्ति करना, प्रशासन पर नियंत्रण रखना, बजट पेश करना, कानून बनाना तथा शांति एवं व्यवस्था स्थापित करना आदि आते हैं।

राज्य विधानमंडल

  • संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य का एक विधानमंडल होगा, जो राज्यपाल, विधानसभा एवं विधानपरिषद (यदि विधानपरिषद हो तो) से मिलकर बनेगा। कुछ राज्यों में केवल एक सदन ही बनाया गया है। जिन राज्यों में दो सदन हैं- वहां के ऊपरी सदन को विधान परिषद् तथा निम्न सदन को विधानसभा कहा जाता है। अनुच्छेद 169 के अनुसार, संसद विधानपरिषद की स्थापना और उसको समाप्त भी कर सकती है, शर्त यह है कि उस प्रान्त की विधानसभा ऐसा करने के लिए दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करे।
  • आजकल पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, केरल, असम, उड़ीसा, नगालैंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय आदि में एक सदन है; परन्तु उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार महाराष्ट्र तथा जम्मू-कश्मीर में विधानमण्डल के दो सदन है।

विधानपरिषद (The Legislative Council)

  • जिन राज्यों में दो सदन हैं, वहां निमसदन को विधानसभा और रूपी सदन को विधानपरिषद कहा जाता है। वर्तमान में भारत के छहराचा- उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर और आंध्र प्रदेश में द्विसदनीय व्यवस्था है।
  • इसके सदस्यों की संख्या विधानसभा के 1/3 भाग से अधिक नहीं हो सकती तथा कम से कम 40 हो सकती है। परन्तु जम्व करमीर को विधानपरिषद में कुल 36 सदस्य हैं। वे सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष नहीं चुने जाते, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से निम्नलिखित ढंग से चुने जाते हैं-
    • विधानपरिषद के 1/3 सदस्य राज्य की स्थानीय संस्थाओं – नगरपालिका, जिला परिषद आदि के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
    • 1/3 सदस्य राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
    • 1/12 सदस्य उन अध्यापकों द्वारा चुने जाते हैं जो राज्य के हायर सेकण्डरी स्कूलों या उसको उच्च शिक्षा संस्थाओं अर्थात् कालेजों में कम से कम तीन वर्ष से पड़ाने का काम कर रहे हों।
    • 1/12 सदस्य राज्य के उन निवासियों द्वारा चुने जाते हैं, जो भारत के किसी विश्वविद्यालय के स्नातक हो तथा कम से कम तीन वर्ष पहले स्नातक की उपाधि उत्तीर्ण कर चुके हों।
    • शेष 1/6 भाग सदस्य राज्यपाल उन व्यक्तियों में से मनोनीत करता है जो राज्य के कला, साहित्य, विज्ञान को-ऑपरेशन (विज्ञान सहकारिता) तथा समाज सेवा में ख्याति प्राप्त कर चुके हों।
  • मनोनीत सदस्यों को छोड़कर शेष सभी सदस्य अप्रत्यक्ष हंग से चुने जाते हैं। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार हस्तानतरणीय मतदान द्वारा किया जाता है।

योग्यताएं

  • विधानपरिषद का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गयी हैं:
    • वह भारत का नागरिक हो।
    • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो, विधानसभा की स्थिति में न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष हो।
    • वह उस राज्य का निवासी हो तथा उसका नाम राज्य की मतदाता सूची में लिखा हुआ हो।
    • वह भारत अथवा राज्य सरकार के अधीन किसी लाभप्रद पद पर आसीन न हो।
    • वह पागल या दिवालिया न हो।
    • वह निर्वाचन संबंधी किसी अपराध के कारण चुने जाने के अधिकार से वंचित न कर दिया गया हो। लगातार 60 दिन तक सदन की स्वीकृति के बिना अधिवेशनों से अनुपस्थित रहने वाले सदस्य के स्थान को रिक्त घोषित कर दिया जाता है।
  • विधानपरिषद एक स्थायी सदन है। इसके सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। प्रत्येक दो वर्ष के बाद इसके 1/3 सदस्य रिटायर हो जाते हैं और उनके स्थान पर नये सदस्य चुने जाते हैं।
  • विधानपरिषद का अधिवेशन आरम्भ होने के लिए यह आवश्यक है कि इसके कुल सदस्यों का 1/10वां भाग या 10 सदस्य उपस्थित हों।

 

सदस्यों के विशेषाधिकार

  • विधानपरिषद के सदस्यों को निम्नलिखित विशेषाधिकार प्राप्त हैं:
    • विधानपरिषद के सदस्यों को सदन में भाषण देने की पूर्ण स्वतंत्रता है।
    • सदन में दिए गये भाषण के लिए सदस्यों के विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।।
    • सदस्यों को सदन का अधिवेशन आरम्भ होने से 40 दिन पहले और अधिवेशन समाप्त होने के 40 दिन बाद तक के बीच के समय में दीवानी मुकदमों के लिए बन्दी नहीं बनाया जा सकता।

सभापति

  • विधानपरिषद अपने सदस्यों में से एक सभापति तथा एक उप-सभापति चुनती है। सभापति की अनुपस्थिति में उप-सभापति उसके काम को चलाता है। इसका वेतन तथा भत्ता राज्य की संचित निधि में से दिया जाता है।
  • अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को सदस्यों द्वारा प्रस्ताव पेश करके हटाया जा सकता है। यह प्रस्ताव उस समय तक पेश नहीं किया जा सकता, जब तक कि इस आशय की पूर्व-सूचना कम से कम 14 दिन पहले न दी गयी हो।

 

अधिवेशन

  • विधानपरिषद का अधिवेशन राज्यपाल द्वारा ही बुलाया जाता है; परन्तु एक वर्ष में इसका दो बार अधिवेशन होना आवश्यक है। एक अधिवेशन से दूसरे अधिवेशन के बीच 6 महीने से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए।

 

विधानपरिषद की शक्तियां

  • विधानपरिषद विधानमण्डल का द्वितीय सदन है, जिसके कारण इसका शक्तियां विधानसभा के मुकाबले में बहुत कम हैं। विधानपरिषद के मुख्य शक्तियां निम्नलिखित हैं:

वित्तीय शक्तियां

  • विधानपरिषद विधानसभा से निर्बल सदन है। वित्तीय मामले में वास्तविक शक्तियां विधानसभा के पास हैं। कोई भी धन विधेयक सबसे पहले विधानसभा में रखा जाता है। जब विधानसभा किसी धन संबंधी विधेयक को पास कर देती है, तो वह विधानपरिषद की सिफारिशों के लिए भेजा जाता है। विधानपरिषद इस विधेयक को 14 दिनों के लिए रोक सकती है।
  • इसके बाद विधानपरिषद अपनी सिफारिशों सहित इस विधेयक को वापस भेज सकती है। विधानसभा की इच्छा पर निर्भर है कि उन सिफारिशों को माने या न माने। यदि14 दिनों की अवधि तक विधानपरिषद किसी विधेयक पर कोई कार्यवाही न करे तो उस अवधि के बाद विधेयक दोनों सदनों में पास समझा जाता है। इससे स्पष्ट है कि वित्तीय मामलों में विधानपरिषद के पास कोई शक्ति नहीं है। वह किसी ऐसे विधेयक को रद्द नहीं कर सकती, बल्कि केवल एक समिति की तरह परामर्श दे सकती है।

विधायी शक्तियां

  • विधानपरिषद में साधारण बिलों को पेश किया जा सकता है; परन्तु उस विधेयक को तब तक राज्यपाल के पास नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि
    उसे विधानसभा न पास करे। विधानसभा की स्वीकृति के बिना कोई विधेयक कानून नहीं बन सकता।
  • विधानपरिषद विधानसभा द्वारा पास किये गये विधेयक को अधिक से अधिक चार महीने (पहली बार तीन महीने और दूसरी बार एक महीना) तक रोक सकती है। जब कोई विधेयक विधानसभा से पास होकर विधानपरिषद के पास आता है तो विधानपरिषद उस विधेयक को नामंजूर कर सकती है, बदल सकती है या तीन मास तक बिना कोई कार्यवाही किये रोक सकती है। इसके बाद यदि विधानसभा इस विधेयक को विधानपरिषद की ओर से किये गये परिवर्तन समेत या वैसे ही पुनः पास कर देती है, तो वह विधेयक विधानपरिषद के पास पुनः भेज दिया जाता है।
  • यदि विधानपरिषद इस विधेयक को पुनः अस्वीकृत कर दे या एक मास तक कोई कार्यवाही न करे तो भी यह विधेयक दोनों सदनों में पास समझा जायेगा। इससे स्पष्ट है कि विधानपरिषद किसी साधारण विधेयक को केवल 4 मास तक रोक सकती है।

कार्यपालिका पर नियंत्रण

  • विधानपरिषद का कार्यकारिणी (मंत्रिपरिषद) पर नियन्त्रण बहुत कम है। मंत्रिमंडल केवल विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होता है। विधानपरिषद मंत्रिमंडल को अविश्वास प्रस्ताव द्वारा नहीं हटा सकती। विधानपरिषद के सदस्य केवल प्रश्न पूछ सकते हैं तथा सरकार की कटु आलोचना भी कर सकते हैं।

विधानपरिषद की उत्पत्ति तथा उत्सादन

  • विधानपरिषद के सृजन एवं उत्सादन का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 169 में किया गया है। यदि विधानसभा 2/3 बहुमत से विधानपरिषद की उत्पत्ति या समाप्ति के लिए कोई प्रस्ताव पेश कर दे तो संसद उसकी उत्पत्ति या समाप्ति के लिए कानून बना सकती है।

विधानसभा (The Legislative Assembly)

  • सभी राज्यों में कानून निर्माण के लिए विधानमण्डल की व्यवस्था की गयी है। कुछ राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं और कुछ में केवल एक ही सदन है। विधानसभा विधानमण्डल का निम्न सदन है। सभी राज्यों में विधानसभाएं पाई जाती हैं।
  • प्रत्येक राज्य में विधानसभा के सदस्यों की संख्या अलग-अलग है। संविधान की अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य विधानसभा के सदस्यों की संख्या कम से कम 60 और अधिक से अधिक 500 होगी। 26 अप्रैल, 1975 को संविधान में 36वां संशोधन पास किया गया, जिसके अनुसार सिक्किम को भारत के पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। इस संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गयी है कि “सिक्किम राज्य की विधानसभा के सदस्य 30 से कम नहीं होंगे; परन्तु अन्य राज्यों की विधानसभाओं की सदस्य संख्या 60 से कम नहीं होगी।”
  • 53वें संशोधन के अनुसार गोवा राज्य की विधानसभा की संख्या 30 से कम नहीं होगी। इनकी संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है।
  • यदि किसी प्रान्त के राज्यपाल को सन्तुष्टि हो कि एंग्लो-इण्डियन समुदाय को विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो वह एक सदस्य इस समुदाय का विधानसभा में मनोनीत कर सकता है। विधानसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप में चुने जाते हैं। प्रत्येक नागरिक को, जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक है, मत डालने का अधिकार है।
  • 42वें संविधान संशोधन 1976 से पूर्व विधानसभा की अवधि 5 वर्ष थी; परन्तु 42वें संशोधन द्वारा विधानसभा की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गयी थी; लेकिन 44वें संशोधन द्वारा इसकी अवधि पुनः पांच वर्ष कर दी गयी।
  • संकट के समय विधानसभा की अवधि को बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रीय संकटकाल की घोषणा के संमय संसद विधानसभा की अवधि को एक समय में एक वर्ष से अधिक नहीं बढ़ा सकती और संकटकाल की घोषणा समाप्त होने के पश्चात् यह इसे 6 महीने से अधिक नहीं बढ़ा सकती।

अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (Speaker and Deputy Speaker)

  • लोकसभा के स्पीकर की तरह राज्य विधानसभा का भी एक स्पीकर तथा एक उपाध्यक्ष होता है। ये दोनों विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। वास्तव में बहुमत दल की इच्छानुसार ही कोई व्यक्ति अध्यक्ष चुना जा सकता है। अध्यक्ष विधानसभा की अध्यक्षता करता है तथा वह वही काम करता है जो लोकसभा का अध्यक्ष करता है।
  • सभापति और उपसभापति को सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पेश करके हटाया जा सकता है। यह प्रस्ताव उस समय तक पेश नहीं किया जा सकता, जब तक कि उस आशय की एक पूर्व सूचना कम से कम 14 दिन से पहले न दी गयी हो।

शक्तियां तथा कार्य (Powers and Functions)

  • जिन राज्यों में विधानमण्डल का एक सदन है, वहां पर विधानमण्डल की सभी शक्तियों का प्रयोग विधानसभा द्वारा किया जाता है और जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं, वहां पर भी विधानसभा अधिक प्रभावशाली है। विधानसभा की मुख्य शक्तियां निम्नलिखित हैं:

विधायी शक्तियां (Legislative Powers)

  • विधानसभा को राज्यसूची तथा समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने के लिए विधेयक पास करने का अधिकार है। राज्य सूची में 66 विषय तथा समवर्ती सूची में 47 विषय हैं। यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है तो विधेयक विधानसभा से पास होकर विधानपरिषद के पास जाता है। यदि विधानपरिषद उसे रद्द कर दे या तीन महीने तक उस पर कोई कार्यवाही न करे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों, तो विधानसभा उस विधेयक को दुबारा पास कर सकती है और उसे दोबारा विधानपरिषद के पास भेजा जाता है।
  • यदि विधानपरिषद उस विधेयक पर दुबारा एक महीने तक कोई कार्यवाही न करे या उसे रद्द कर दे या उसमें ऐसे संशोधन कर दे जो विधानसभा को स्वीकृत न हों, तो तीनों अवस्थाओं में यह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पास समझा जायेगा।

वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)

  • राज्य के वित्त पर विधानसभा का ही नियन्त्रण होता है। धन विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश हो सकते हैं। वित्तीय वर्ष के आरम्भ होने से पहले राज्य का वार्षिक बजट भी इसी के सामने प्रस्तुत किया जाता है। विधानसभा की स्वीकृति के बिना राज्य सरकार न कोई टैक्स लगा सकती है और न ही कोई पैसा खर्च कर सकती है। विधानसभा में पास होने के बाद धन विधेयक विधानपरिषद के पास भेजा जाता है (यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है)। जो उसे अधिक से अधिक 14 दिन तक पास होने से रोक सकती है। विधानपरिषद चाहे धन विधेयक को रद्द करे या 14 दिन तक उस पर कोई कार्यवाही न करे, तो भी वह दोनों सदनों द्वारा पास समझा जाता है और राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है, जिसे धन विधेयक पर अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over Executive)

  • विधानसभा को कार्यकारी शक्तियां भी मिली हुई हैं। विधानसभा मंत्रिपरिषद पर पूर्ण नियन्त्रण है। मंत्रिपरिषद अपने समस्त कार्यों व नीति के लिए विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। विधानसभा के सदस्य मंत्रियों की आलोचना कर सकते हैं, प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। विधानसभा चाहे तो मंत्रिपरिषद को हटा भी सकती है।।
  • विधानसभा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास करके अथवा धन विधेयक को अस्वीकृत करके तथा मंत्रियों के वेतन में कटौती करनी अथवा सरकार के किसी महत्त्वपूर्ण विधेयक को अस्वीकृत करके मंत्रिपरिषद को त्याग-पत्र देने के लिए मजबूर कर सकती है।

संवैधानिक कार्य शक्तियां (Constitutional Powers)

  • राज्य विधानसभा को संविधान में संशोधन करने का कोई महत्त्वपूर्ण अधिकार नहीं प्राप्त है। संशोधन करने का अधिकार संसद को ही प्राप्त। है, परन्तु संविधान में कई ऐसे अनुच्छेद हैं, जिनमें संसद अकेले संशोधन नहीं कर सकती।
  • ऐसे अनुच्छेदों में संशोधन करने के लिए आधे राज्यों के विधानमण्डलोंकी स्वीकृति भी आवश्यक होती है। अतः विधानपरिषद के साथ मिलकर (यदि विधानमण्डल द्विसदनीय है) विधानसभा संविधान के संशोधन में भाग लेती है।

उच्च न्यायालय

संविधान द्वारा राज्यों के लिए उच्च न्यायालयों की व्यवस्था की गयी है। अनुच्छेद 216 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा कुछ अन्य न्यायाधीश होते हैं। अन्य न्यायाधीशों की संख्या संविधान के अन्तर्गत निश्चित नहीं की गयी है। उनकी संख्या आवश्कतानुसार राष्ट्रपति निश्चित करता है। अतः प्रत्येक उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या भिन्न-भिन्न है। यह आवश्यकतानुसार घटती-बढ़ती रहती है। उधर सर्वोच्च न्यायालय की संख्या संसद निश्चित करती है।

जब किसी उच्च न्यायालय में किसी कारणवश मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हो अथवा मुख्य न्यायाधीश किसी कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। जब उच्च न्यायालय का अस्थायी तौर पर कार्य बढ़ जाता है या पिछले इकट्ठे हुए काम को निपटाने के लिए राष्ट्रपति अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सकता है। परन्तु अतिरिक्त न्यायाधीशों की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं हो सकती। यदि उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश बीमारी तथा किसी अन्य कारण से अपने पद से अनुपस्थित हो, तो राष्ट्रपति उसके स्थान पर अस्थायी न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश सहित अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

न्यायाधीशों की योग्यताएं (Qualifications): अनुच्छेद 217 (2) में न्यायाधीशों की अर्हताओं का उल्लेख है :

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. भारत में कम से कम 10 वर्ष तक किसी न्यायिक पद पर रह चुका हो।
  3. किसी भी राज्य के उच्च न्यायायल या एक से अधिक राज्यों के उच्च न्यायालयों में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रह चुका हो।

 

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 217): उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश से, उस राज्य के राज्यपाल तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके की जाती है।
  • उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ (1993) में यह निर्णय दिया है कि उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में उच्चतम न्यायालय के 2 वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह लेना अनिवार्य है, किन्तु स्थानांतरण के संबंध में उच्चतम न्यायालय के 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श को अनिवार्य किया गया तथा जिस उच्च न्यायालय में स्थानांतरण किया जाना है वहां मुख्य न्यायधीश से परामर्श करना अनिवार्य होगा।
  • मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति (अनुच्छेद 217): उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
    तथा राज्य के राज्यपाल से विचार-विमर्श करने के पश्चात् की जाती है।
  • कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति (अनुच्छेद 233): उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद रिक्त या अनुपस्थिति होने पर या कर्त्तव्यों का पालन करने में असमर्थ पर राष्ट्रपति न्यायालय के न्यायाधीशों में किसी को मुख्य न्यायाधीशों के कार्यों का निर्वाह करने के लिए नियुक्त कर सकता है।
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 224): उच्च न्यायालय में कार्यों की अस्थाई वृद्धि हो जाय और राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि कार्यों के सम्पादन के लिए न्यायाधीशों की आवश्यकता है तो वह न्यायाधीश की योग्यता रखने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष के लिए अपर न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकता है।
  • सेवानिवृत न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 228) : उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति से सहमति लेकर किसी भी समय न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुके व्यक्ति को न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है।

उच्च न्यायालय की शक्तियां

प्रत्येक उच्च न्यायालय को तीन प्रकार की शक्तियां प्राप्त हैं :

  1. न्याय संबंधी,
  2. प्रशासन संबंधी, तथा
  3. न्यायिक पुनर्निरीक्षण से संबंधित।।

 

  1. न्याय संबंधी शक्तियां – न्याय संबंधी कार्यों को दो भागों में बांटा जा सकता है:
    1. प्रारम्भिक अधिकार क्षेत्र (Original Jurisdiction): उच्च न्यायालय प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 226 के माध्यम से मौलिक अधिकारों के उल्लंधन पर विभिन्न प्रकार की प्रत्यक्ष रिट प्रत्यक्ष रूप से निकाल सकता है।
    2. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction): सभी उच्च न्यायालय अपने अधीन न्यायालयों के फैसलों के विरुद्ध ऐसे मामले में अपील सुन सकते हैं:
      • जब एक अपराधी को सेशन न्यायाधीश ने 4 वर्ष के लिए कारावास का दण्ड दिया हो।
      • यदि सेशन न्यायालय ने किसी अपराधी को मृत्यु दण्ड दिया हो, तो उसकी पुष्टि उच्च न्यायालय से करवानी पड़ती है।
      • पेटेण्ट तथा डिजाइन, उत्तराधिकार, भूमि प्राप्ति, दिवालियापन और संरक्षता इत्यादि अभियोगों में भी उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
      • बहुमत से सम्बद्ध राजस्व संबंधी मामलों में भी निचले न्यायालयों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। आयकर संबंधी अभियोगों की अपीलें भी यहां प्रस्तुत हो सकती हैं।
      • कोई भी ऐसा मुकदमा, जिसमें संविधान की व्याख्या का प्रश्न निहित हो।
  2. प्रशासन संबंधी अधिकार – उच्च न्यायालय अपने अधीन किसी न्यायालय के कागजों को मंगवा कर उसकी जांच-पड़ताल कर सकता है। संविधान का अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार देता है, जो न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने या उसमें संशोधन करने का अधिकार उच्च न्यायालय को पहले प्राप्त नहीं था। परन्तु, 44वें संशोधन के अन्तर्गत इस नयी धारा को हटा दिया गया है। अब उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ किसी भी न्यायालय के निर्णय की पूछताछ कर सकता है।
    1. अन्तरण संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 228): उच्च न्यायालय को यह आभास हो जाय कि अधीनस्थ न्यायालयों मे लम्बित मामला संविधान की व्याख्या के सम्बंध में कोई प्रश्न विचारणीय है, तो वह उन मामलों को अपने पास मंगा सकता है और सम्बंधित मामलों पर निर्णय ले सकता है। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों में लम्बित मामलों को किसी अन्य अधीनस्थ न्यायालय में अंतरित कर सकता है।
    2. अधीक्षण क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 227): प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार के सभी अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों का अधीक्षण कर सकता है।
  3. न्यायिक पुनर्निरीक्षण से संबंधित – 
    • उच्च न्यायालय राज्य के अन्दर शीर्ष पर है और राज्य के अन्य न्यायालय इसके अधीन हैं; परन्तु ये पूर्ण रूप से स्वतन्त्र नहीं हैं; क्योंकि ये सर्वोच्च न्यायालय के अधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों का उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में महत्त्वपूर्ण हाथ होता है। सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 136 के अन्तर्गत किसी भी न्यायालय के किसी भी मामले में अपील सुनने की विशेष आज्ञा दे सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय उच्च न्यायालय पर बाध्य हैं और उन्हें उनके अनुसार चलना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालयों को आदेश भी दे सकता है, जिनका उन्हें पालन करना पड़ता है। 42वें संशोधन द्वारा उच्च न्यायालय की शक्तियों को सीमित किया गया था; परन्तु 43वें संशोधन द्वारा न्यायिक पुनर्निरीक्षण की इसकी पहले वाली शक्ति कायम कर दी गयी है। 44वें संशोधन द्वारा इसकी स्थिति बिलकुल 42वें संशोधन से पूर्व जैसी स्थापित की गयी है।
    • रिट के संबंध में उच्चतम व उच्च न्यायालय की शक्ति : रिट निकालने के संबंध में उच्च न्यायालय के पास उच्चतम न्यायालय से अधिक शक्ति है, क्योकि उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत केवल मूलाधिकार रिट को जारी कर सकता है जबकि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत मूल अधिकार के साथ-साथ अन्य अधिकारों से संबंधित रिट जारी कर सकता है।
      • भारतीय संविधान के भाग छह के अध्याय पांच में अनुच्छेद 214 से लेकर 232 तक राज्यों के उच्च न्यायालय के संगठन एवं अधिकारिता का उल्लेख किया गया है।
      • असम, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम के लिए गुवाहाटी स्थित असम का उच्च न्यायालय इनका सम्मिलित न्यायालय है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सामान्यतः 62 वर्ष की आयु तक अपना पद धारण करते हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष तक।
      • साबित कदाचार एवं असमर्थता के आधार पर संसद के दोनों सदन अपने उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से सम्बर न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव पारित कर सकते हैं।
      • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर अवकाश प्राप्ति के बाद वकालत कर की मनाही नहीं है।
      • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 30 हजार और अन्य न्यायाधीश को 26 हजार रुपये मासिक वेतन मिलते हैं।
      • उच्च न्यायालयों के प्रारम्भिक, अपीलीय, प्रशासन संबंधी तथा न्यायिक समीक्षा संबंधी अधिकारिता प्राप्त है।
      • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को पांच प्रकार के रिट जारी करने का अधिकार है।
      • उच्च न्यायालय को राज्य के कानून और केन्द्रीय कानून दोनों की संवैधानिक वैधता की जांच करने का अधिकार है।
      • संविधान का अनुच्छेद 231 दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक सम्मिलित उच्च न्यायालय की व्याख्या करता है। संविधान का अनुच्छेद 220 न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान उनके प्रैक्टिस किये जाने पर प्रतिबंध लगाता है।
      • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जा सकता है (अनुच्छेद 222)। यह अधिकार राष्ट्रपति को है जिसका प्रयोग वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर करता है।

अधीनस्थ न्यायालय

भारत की न्यायापालिका के संगठन में सबसे निम्न स्तर पर अधीनस्थ न्यायालय की स्थापना की गयी है। अधीनस्थ न्यायालय को भी कार्यपालिका से स्वतन्त्र रखा गया है, जिसका वर्णन अनुच्छेद 233 के अंतर्गत किया गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार –

  1. अधीनस्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाये।
  2. जिला न्यायाधीश से भिन्न व्यक्तियों को किसी राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्त उस राज्य के लोकसेवा आयोग तथा सम्बद्ध उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात् की जायेगी।
  3. जिला न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों का नियन्त्रण उच्च न्यायालय में निहीत होता है।
  4. जिला न्यायाधीशों और उनके न्यायिक पदाधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का अधिकार उच्च न्यायालय को है।
  5. राज्य का राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करके जिला न्यायाधीश की नियुक्ति करता है।
  6. उच्च न्यायालय की सिफारिश पर राज्यपाल उस व्यक्ति को जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त कर सकता है, जो कम से कम 7 वर्ष तक किसी न्यायालय में अधिवक्ता रहा हो।

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