पहला भाग (अनच्छेद 1 से 4 तक) – संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र – Hindi Notes

The Union and Its territories - Part-1 (Article 1 to 4) - पहला भाग (अनच्छेद 1 से 4 तक) - संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र
The Union and Its territories - Part-1 (Article 1 to 4) - पहला भाग (अनच्छेद 1 से 4 तक) - संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र

The Union and Its territories – Part-1 (Article 1 to 4) – पहला भाग (अनच्छेद 1 से 4 तक) – संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र


The Union and Its territories – संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र महत्वपूर्ण बिंदु 

  • संविधान के अनुच्छेद 1(i) के द्वारा भारत को ‘राज्यों का संघ’ घोषित किया गया है। इस समय भारतीय संघ में 29 राज्य एवं 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। केन्द्र द्वारा शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली भी शामिल है।
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसार, किसी समय विशेष पर ‘भारत का राज्य-क्षेत्र’ वह राज्य-क्षेत्र है, जो संविधान के अनुच्छेद 1 के अंतर्गत पहली अनुसूची में निर्दिष्ट है। जम्मू-कश्मीर, जिसे संविधान में विशिष्ट स्थिति प्राप्त है, को छोड़कर संविधान के राज्यों से संबंधित उपबंध सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होते हैं।
  • ‘भारत संघ’का अर्थ भारत के राज्य-क्षेत्र से भिन्न है। ‘संघ’ में वे राज्य आते हैं, जो संघ की शक्तियों में बराबर के हिस्सेदार हैं, जबकि ‘भारत के राज्य-क्षेत्र से आशय उन सभी क्षेत्रों से है, जिस पर भारत की प्रभुता का विस्तार है। इस प्रकार राज्यों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के राज्यक्षेत्र हैं जो ‘भारत के राज्यक्षेत्र में सम्मिलित हैं अर्थात् 1987 से संघ राज्यक्षेत्र में 7 प्रदेश शामिल हैं- दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा और नागर हवेली, दमन और दीव, पांडिचेरी तथा चंडीगढ़।
  • अनुच्छेद 2 में उपबंध किया गया है कि संसद विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों और जो वह ठीक समझे, भारत संघ में नए राज्यों ला प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकेगी|
  • अनुच्छेद 3 के अधीन संसद को किसी राज्य में से उसका राज्य क्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को या राज्यों के भागों को मिलाकर अथवा किसी राज्य क्षेत्र को किसी राज्य के भाग के साथ मिलाकर नये राज्य का निर्माण करने की शक्ति प्राप्त है। वह किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा या घटा सकती है और यहां तक कि किसी राज्य की सीमाओं में या उसके नाम में परिवर्तन भी कर सकती है। इस प्रकार किसी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता अथवा उसके अस्तित्व के बने रहने की कोई गारंटी नहीं है। किन्तु, सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि किसी राज्य क्षेत्र को घटाने की संसद की शक्ति में भारतीय राष्ट्रीय क्षेत्र को किसी विदेशी राज्य को समर्पित करने की शक्ति सम्मिलित नहीं है। अतः कहा जा सकता है कि भारत नाशवान राज्यों का अविनाशी संघ है।’
  • राज्यों को अनुच्छेद 3 के अंतर्गत उनके राज्य क्षेत्रों में परिवर्तन के संबंध में अपनी बात कहने का अधिकार है. परंतु राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त विचार राष्ट्रपति या संसद पर बाध्यकारी नहीं होते।।
  • अनुच्छेद 4 में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 2 और 3 के अधीन नये राज्यों की स्थापना या उनके प्रवेश और विद्यमान राज्यों के नामों, क्षेत्रों और उनकी सीमाओं आदि में परिवर्तन के लिए बनायी गयी विधियां अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन नहीं मानी जायेंगी; अर्थात् इन्हें बिना किसी विशेष प्रक्रिया के तथा किसी भी अन्य साधारण विधान की तरह साधारण बहमत द्वारा पारित किया जा सकता है।
  • हालांकि संविधान में नये राज्य क्षेत्रों के अर्जन, नये राज्यों के प्रवेश तथा निर्माण आदि का उपबंध किया गया है, किंतु इसमें भारतीय राज्य क्षेत्र को अलग करने या अंतरित करने का कोई उपबंध नहीं है।
  • राष्ट्रपति द्वारा राय मांगे जाने पर उच्चतम न्यायालय ने बेरुबाड़ी वाद (1960) में राय व्यक्त की थी कि संविधान संशोधन के बिना कोई राज्य क्षेत्र दूसरे को नहीं सौंपा जा सकता। इसलिए, बेरुबाड़ी राज्य क्षेत्र के भाग को पाकिस्तान को अंतरित करने के लिए संविधान का नौवां संशोधन अधिनियम पारित किया गया था।
  • शक्ति-विभाजन के दृष्टिकोण से संघ शक्तिशाली है।
  • राज्यपालों की नियुक्ति, एकीकृत न्यायपालिका, इकहरी नागरिकता, केन्द्र द्वारा राज्यों के मतभेदों का निवारण, राज्यों की दुर्बल वित्तीय स्थिति, दोहरे संविधान का अभाव, योजना आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद् आदि भारतीय संघ के एकात्मक लक्षण हैं|
  • भारत में सहयोगी संघवाद की स्थापना के लिए इन संस्थाओं की निष्पक्ष एवं सक्रिय भूमिका आवश्यक है- राष्ट्रीय विकास परिषद, योजना आयोग, अन्तर्राष्ट्रीय परिषद वित्त आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, क्षेत्रीय परिषदें अखिल भारतीय सेवाएं, पंचायती राजव्यवस्था, मुख्यमंत्री का सम्मेलन राज्यपालों का सम्मेलन।
  • राज्यसभा में राज्यों के लिए समान प्रतिनिधित्व की व्यवस्था नहीं की गयी है। प्रतिनिधित्व आबादी के आधार पर दिया गया है, जबकि अमरीका एव
  • आस्ट्रेलिया के उच्च सदनों में इकाइयों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। ग्रेनविन ऑस्टिन ने भारत के लिए ‘सहकारी संघवाद’ शब्द का प्रयोग किया है। ए.एच. बिर्च भी इसे ‘सहकारी संघवाद’ बताते हैं।एपलबी के अनुसार, भारत का संविधान अत्यन्त परिसंघीय है।
  • अनुच्छेद 249, 250 और 252, राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार संघीय संसद को देते हैं।
  • भारत शासन अधिनियम, 1935 में सर्वप्रथम परिसंघ की कल्पना प्रस्तुत की गयी है।
  • अनुच्छेद 137 के अनुसार, संविधान की व्याख्या करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय के पास है और एस.आर. बोम्बई बनाम भारत संघ (1993) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि भारतीय संविधान एक संघीय संविधान है।
  • एक ओर के.सी. व्हीलर, चाको, सुभाष कश्यप आदि विद्वान भारतीय संविधान की प्रकृति को एकात्मक बताते हैं, तो दूसरी ओर ग्रेनविन ऑस्टिन, एलेक्जेण्ड्रोविच,नारमन.डी. पॉमर एवं डॉ.अम्बेडकर आदि भारतीय संविधान के स्वरूप एवं उसकी प्रकृति को मुख्यतः संघात्मक मानते हैं।

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